#118

हर बात पे तेरे यूँ मुस्कुराने की अदा
छिप के छिपा के नज़रे मिलाने की अदा
और तुमको लगता है तुम खूबसूरत हो
यहाँ रहते सभी लड़को की आखिरी जरुरत हो..तो सुन लो..
तो सुन लो ये ग़लतफहमी तेरी
की सब तुमको देखा करते हैं
या फिर आँखे सेका करते हैं

बोलते बोलते भौहों को उठाने की अदा
बीच बीच में तेरे ये शर्माने की अदा
और थोड़ी देर में जो घड़ी देखती हो
की तुमको लगता है आखिरी मोहब्बत हो
तो सुन लो..
तो सुन लो ये बेकरारी तेरी
या फिर तेरा है सस्ता नशा
की सब तुमको देखा करते हैं
या आँखे सेका करते हैं।।।

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#117

तुम ख्वाब में कुछ
सामने कुछ और नज़र आती हो
अब मैं ख्वाब को प्यार कह लूँ
या प्यार को ख्वाब

माँ

कल रात वापिस आने पर व्हाट्सएप्प चेक किया ना

तो कितने ही मैसेज ग्रुप्स में और कितने ही स्टेटस

सभी ने अपनी माँ की तस्वीर लगा रखी थी

कल मदर्स डे था ना माँ यानी तुम्हारा दिन

पर माँ मेरा तो रोज ही होता है न एक दिन फिर क्यों

मैं और मेरा हर दिन तो तुम्हारा है न माँ जबसे

छोटा सा मैं और बड़ी मेरी जिद्द को तुम शांत करती थी

रोते यूँ ही कई दफा सो जाया करता था तुम्हारी गोद में

तुम्हारा भी तो हर दिन मेरे लिए होता था ना माँ

झूठी कहानियां सुना कर मुझे खाना खिलाती थी तुम

कई बार डांट देती रोऊँ तो सीने से लगा लेती थी

मेरे हर दर्द को अपना बना के सहा है न माँ

सही गलत की पहचान तो मुझे तुमसे ही मिली थी

मेरे दुखी होने से पहले जान लेना तेरा

या मेरी तबियत खराब होने पर रात रात जागना

मेरा खुदसे भरोसा उठ जाए पर तुम्हारा मुझसे नहीं

कई बार देखा है कई रूप में देखा है तेरा प्यार

कभी चाची, मौसी, दादी, बुआ, दीदी ,भाभी कभी खुद

पर हर बार कुछ नया मिलता है तुमसे मुझे न माँ

कहते हैं समझने लगा हूँ मैं सब मुझे लगता है

पर आज भी तेरे लिए वही नासमझ हूँ न माँ

मिलने पे घंटो जो तुम समझाती हो
उदास बैठु तो तभी फ़ोन करती हो

बिना बोले सब समझ जाती हो
मैं मुकर जाता हूँ ना माँ
पर तुम तो सब जानती हो।।।।।
लव यू माँ।।।। मेरा हर दिन आपका है।।।।

।।।वैभव सागर।।।

आज की शकुन्तला

कही कभी मिल जाती है
आज भी शकुन्तला कोई ।।।
जो दुष्यन्त के ख्यालों में
रहती है अपनी सुध खोयी
वापस आने की आहट में
में दिन रातें निगाहें रोयी
या याद किया करती हैं
उसकी दी हुई निशानियां
वो पहली बार मिले जंगल
और बनती वो कहानियां
कितने सपने समेटे हुए
कई रातें फिर ना सोयी
कहीं कभी मिल जाती है
आज भी शकुन्तला कोई।।।
जो दुहाई देती है अपने
प्यार और हर निशानी की
समाज से डरती है आज
कल के दुर्वासा की वाणी सी
पर न मिलता है न्याय उसे
ना मिला ही दुष्यन्त कोई
यूँ डरती फिरती है वो
सहमी सहमी खोयी खोयी
कहीं कभी मिल जाती है
आज भी शकुन्तला कोई।।।
निशानी मिली देख दुष्यन्त
वो याद सबकुछ आ गया
मिलने जा पहुंचा वहां
और भरत को भी पा गया
पर आज का दुष्यन्त
सारी यादों को दफना गया
और सवाल उठा फिर से
शकुन्तला फिर है रोई
कहीं कभी मिल जाती है
आज भी शकुन्तला कोई ।।।।।।।

तेरा हक़

क्या हक़ था तुम्हे , यूँ मुझे छोड़ जाने का

किसी और की बात का इतना बुरा मान जाने का

या शायद किसी और के प्यार को अपनाने का

कहा तो होता एक भी बार

मजबूरियां

थी तेरी तो थी मेरी भी कुछ

पर क्या हक़ था मुझे यूँ रुलाने का

अच्छा वो सारे हक़ जो मैंने दे रखे थे

या कुछ तुमने ले भे लिए थे जबर्दस्ती

की तुम मेरे हो तो तेरा सब मेरा

की तुम मेरे हो तो तेरा सब मेरा

फिर क्या हक़ था उस हक़ को मिटाने का

सारे हक़ तेरे थे उसमे

सारा का सारा मैं था तुम्हारा

पर क्या हक़ था मुझे यूँ आज़माने का

अब तो सब खो चुका हूँ मैं

वो कंधा भी जहाँ सर रखके रो सकू

वो दोस्त भी जो मेरा हक़ था जिसपे

या फिर वो की अपने ऊपर अधिकार

कुछ भी तो नहीं बच रहा मुझमे

सिर्फ मैं ही बचा हूँ

फिर क्या हक़ था सब छीन जाने का

वो दोस्त जो मेरे साथ रोया

या मुझसे ज्यादा उसपे क्या हक़ था तुम्हारा

वो माँ मेरी जिसे मेरी तबियत खराब लगती थी

मिन्नतें मांगती रही उसपे क्या हक़ था तुम्हारा

वो भाई जिसने मुझे समझाया

हर पल साथ निभाया उसपे क्या हक़ था

की अचानक से तेरे खामोश होने का

क्या हक़ था तेरा यूँ खोने का

चलो सब मुझसे जुड़े है मेरी खातिर

पर मेरा भी तो हक़ दो

वो हक़ जो रात भर तेरे एक

मैसेज की खातिर जगा पर आया नहीं

जो तुमसे बात करने को

घर से बहाने मार कर निकल जाता

पर तभी तुम बिजी होती

या फिर वो हक़ जो इंतज़ार में काटी

या मेरा वो हक़ जो तेरी ओर बांटी

अरे इत्ता न सही फिर दोस्ती का भी तो

एक वो हक़ जो लड़ा खुदसे तेरे लिए

हक़ जो तेरे लिए हर सांस में था

वो हक़ की सपने तेरे देखे थे मैंने

या वो हक़ जो आज भी इंतज़ार में है

या फिर वो हक़ जो मेरे प्यार में है।।।।

तू यहीं है नहीं।।

तू यहाँ है नहीं
है इस पल हर जगह
धक्के खाती बस में
सुकून की हवा
हर शायर की जूझ में
तू दर्द सी दवा
और एक शांत बहती
नदी की धार सा
या फिर ढूंढता फिरे
तू तेरा पता
तू यहाँ है नहीं
है इस पल हर जगह

पुरे जेठ की धूप में
एक ठंढी दुआ
कहीं किसी के लिए
एक जीने की वजह
तो कहीं आईना है
जैसा मिले वैसा मिला
या बच्चों के खेल में
एक मुस्काती वफ़ा
तू यहाँ है
नहीं
है इस पल हर जगह।।।

बात की बात

बात की बात में बात ही चली गई
यूँही मुलाकातों में रात ही चली गई
जो बात जुबाँ पे थी आके रुकी कबसे
लहरों उठी तो वो बात ही चली गई
सवेरा जब हुआ हुई तलाश रात की
रात में जो बात थी वो बात ही चली गई ।।।

पलाश

किशन आज पूरे 8 साल बाद अपने घर लौट रहा था जबसे वो अमेरिका गया था और फिर वहीं का होकर रह गया था।
अपने पिता को काफी छोटी उम्र में खो देने के बाद उसकी माँ ने उसका ख्याल रखा था उसकी हर जरुरत को पूरा किया था। जब वो घर की ओर जाने वाली बस पर बैठा तो हर तस्वीर पूरी तरह बदली लग रही थी, नए घर , नई सड़क।
किशन अपने फ़ोन पर बातें करते हुए जा रहा था और उसकी बगल की सीट पर बैठे बुजुर्ग उसे घूरे जा रहे थे । वो यहाँ अपनी बची खुची संपत्ति बेचने जा रहा था, एक पुशतैनी घर और थोड़ी बंजर जमीन जिसपर इधर उधर फैले पलाश के गाछ थे । सारी उपजाऊं जमीन पहले ही उसकी मां उसके जरूरतों को पूरा करने में बेच चुकी थी।

अभी पिछले महीने ही उसकी माँ का देहांत हो गया था और राम्या ने उसे फ़ोन करके बतलाया था पर वह कुछ ज्यादा ही व्यस्त था अपने फ्यूचर प्लानिंग्स को लेकर और इतना पढ़ा लिखा भी की करियर के लिए अपनी जिम्मेदारी को समझ सके, तो आने से उसने मना कर दिया यह कहकर की अब माँ नहीं रहीं तो आके क्या करूँगा। लेकिन आज जब उसे अपने नये काम के लिए पैसों की जरुरत थी तो वह उन्हें बेचने जा रहा था।

“कहाँ जाबे के हो ” पास बैठे बुजुर्ग ने फ़ोन कटते ही पूछा।

“छोवा” उसने अनमने ढंग से गांव का नाम बताया।
“केकरा लग”
“बिरजू” उसने डांटने के लहजे से जबाब दिया और बेचारा बुजुर्ग तबतक चुप हो गया जबतक किशन बस से उतर नहीं गया ।
बस से उतारते ही वो जितना रिलैक्स महसूस कर रहा था सामने पक्की सड़क और अंजान घरों को देखकर बिकुल परेशान सा हो गया अब उसे रास्ता भी याद नहीं ।
“भैया बिरजू के घर कैसे जाऊँ?” उसने पास से गुजर रहे युवक से पूछा।
“सामने से दाएं वहां मंदिर मिलेगा वहां आप किसी से पूछ लीजियेगा” युवक ने बड़े साफ़ आदर के साथ कहा ।
“धन्यवाद्” बड़बड़ाते हुए किशन आगे बढ़ गया।

मंदिर के पास पहुँचते ही उसके दिमाग का कोहरा जैसे छंट गया ये वो मंदिर है जहाँ मैं अपनी माँ के साथ आया करता था। और ये रास्ता है बिरजू के घर जाने का। इधर ये कुआँ जहाँ से सभी पानी भर कर लाया करती थी और एक बार तो राम्या इसमें गिर भी गयी थी मेरा पीछा करते हुए।
एक अनजान मुस्कराहट उसके चेहरे पर फ़ैल गयी न जाने किस कारन से शायद राम्या की याद से या फिर रास्ता मिल जाने की ख़ुशी।

बिरजू अपने घर के बहार बैठा है दूर से दिख जाने वाली काया , हाँ बिरजू ही बैठा है।
बिरजू से कुछ ओपचारिक बातें करने के बाद बिरजू ने उसे उसके घर की चाभी दे दी, उसके माँ के जाने के बाद वही उसके घर की देखभाल कर रहा था।
ये रहा मेरा घर, उसने घर का दरवाजा खोला और दरवाजे के पास ही खड़े पलाश के गाछ पर एक दृष्टि डाली मनो कह रहा हो की धन्यवाद् मेरे घर की देखभाल करने के लीये।।
तभी पीछे से उसे किसी की आवाज सुनाई दी जो उसे पुकार रही थी पलट कर देखा तो राम्या थी।
“तुम यहाँ कैसे रहोगे काफी गन्दा है चलो मेरे घर बिरजू भैया ने बुलाया है”
“हाँ , तुम सही कह रही हो ” कहकर किशन राम्या के पीछे वापस बिरजू के घर की तरफ चल दिया ।
“और तुम्हारी शादी हो गयी” किशन ने यूँ ही पूछा
“नहीं कोई मिला है नहीं जो मुझे झेल सके” कहकर राम्या हंस दी
“तुम बिलकुल नहीं बदली”
“पर तुम बदल गए हो” राम्या ने उसे जैसे अहसास करने की चाही।

रात को खाने के बाद सब सो रहे थे पर जैसे किशन की आँखों से नींद गायब हो गयी थी राम्या की हँसी बस यहीं उसके दिमाग में चल रहा था। माँ ने कहा था कि राम्या और किशन की शादी करा देंगी पर मैं वापस नहीं आया।
हंसी राम्या की मेरी बेबसी पर मेरे सवाल पर और ऐसा सोचते सोचते वो अतीत में खोता चला गया।
राम्या ने उसे होली में रंग लगाने की कोशिश की तो वो भाग गया ये कहकर की रंग से मुझे एलर्जी है और मुझे दो दिन बाद वापस होस्टल भी जाना है और फिर राम्या ने उसे पलाश के फूलों से बना रंग लगाया था।

अगले दिन जब खरीददार आये तो उसने साफ़ मना कर दिया
खरीददार ने काफी कोशिश की उसे मानाने की पर उसने घर बेचने से मना कर दिया और अपने घर की ओर चल दिया।
दरवाजा खोलते ही उसने वही खड़े पलाश के पेंड को कसकर पकड़ लिया और हवाओं में निकलती आवाज मैं खो गया।
एक छोटा बच्चा अपनी माँ से रंग मांग रहा है
और माँ उसे नन्हे हाथों में फूल दे रही है और कह रही है कि हम इसके रंग बनाएंगे।
एक बूंद नमक की उसकी आँखों से निकल गयी और पेंड को और कसकर पकड़ लिया।
“नहीं माँ मैं नहीं जाना चाहता हूँ अमेरिका यहीं पढूंगा न तुम्हारे पास रहकर।”
“बस तीन साल की बात है बेटे यूँ निकल जाएगी और फिर राम्या है बिरजू है सभी तो हैं यहाँ।
राम्या पीछे से आ गयी उसे ये जानकार अचरज हुआ की किशन ने बेचने से मना कर दिया
“मैं वापस नहीं जा रहा ”
“पर तुम यहाँ करोगे भी क्या ”
“तुमसे शादी” राम्या का हाथ पकड़ते हुए किशन ने कहा।
“और”
“और फैक्ट्री डालूंगा”
“किसकी ?”
“रंगों की”
और वहां चार आँखें रो रही थी कुछ नमक और मोती आँखों से झर रहे थे और नीचे गिरे हुए पलाश के फूलों में समां रहे थे।।।
©वैभव सागर