#120

तेरी तस्वीर जो दिल से लगी थी

उसको सहलाना छोड़ दिया

जो मैंने दिल लगाना छोड़ दिया

तो तुझे मनाना छोड़ दिया

तेरी बातें जो साथ थी मेरे हमेशा

उसे दोहराना छोड़ दिया

तोहफे तेरे दिल जला रहे थे

अब उसे बुझाना छोड़ दिया

जा तू किसी और की हो ले यहाँ

अब आंसू बहाना छोड़ दिया

जो मैंने दिल लगाना छोड़ दिया

तो तुझे मनाना छोड़ दिया।।

वैभव सागर

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#119

मुन्तज़िर* हूँ की ये रात निकल जाएगी

अकेले रो लूँ तो दिल की बात निकल जाएगी

ए दोस्तों न दिया गया जबाब तुम्हारी बातों का

जो कहीं लब खुले तो बरसात निकल जाएगी।।।

#117

तुम ख्वाब में कुछ
सामने कुछ और नज़र आती हो
अब मैं ख्वाब को प्यार कह लूँ
या प्यार को ख्वाब

माँ

कल रात वापिस आने पर व्हाट्सएप्प चेक किया ना

तो कितने ही मैसेज ग्रुप्स में और कितने ही स्टेटस

सभी ने अपनी माँ की तस्वीर लगा रखी थी

कल मदर्स डे था ना माँ यानी तुम्हारा दिन

पर माँ मेरा तो रोज ही होता है न एक दिन फिर क्यों

मैं और मेरा हर दिन तो तुम्हारा है न माँ जबसे

छोटा सा मैं और बड़ी मेरी जिद्द को तुम शांत करती थी

रोते यूँ ही कई दफा सो जाया करता था तुम्हारी गोद में

तुम्हारा भी तो हर दिन मेरे लिए होता था ना माँ

झूठी कहानियां सुना कर मुझे खाना खिलाती थी तुम

कई बार डांट देती रोऊँ तो सीने से लगा लेती थी

मेरे हर दर्द को अपना बना के सहा है न माँ

सही गलत की पहचान तो मुझे तुमसे ही मिली थी

मेरे दुखी होने से पहले जान लेना तेरा

या मेरी तबियत खराब होने पर रात रात जागना

मेरा खुदसे भरोसा उठ जाए पर तुम्हारा मुझसे नहीं

कई बार देखा है कई रूप में देखा है तेरा प्यार

कभी चाची, मौसी, दादी, बुआ, दीदी ,भाभी कभी खुद

पर हर बार कुछ नया मिलता है तुमसे मुझे न माँ

कहते हैं समझने लगा हूँ मैं सब मुझे लगता है

पर आज भी तेरे लिए वही नासमझ हूँ न माँ

मिलने पे घंटो जो तुम समझाती हो
उदास बैठु तो तभी फ़ोन करती हो

बिना बोले सब समझ जाती हो
मैं मुकर जाता हूँ ना माँ
पर तुम तो सब जानती हो।।।।।
लव यू माँ।।।। मेरा हर दिन आपका है।।।।

।।।वैभव सागर।।।

आज की शकुन्तला

कही कभी मिल जाती है
आज भी शकुन्तला कोई ।।।
जो दुष्यन्त के ख्यालों में
रहती है अपनी सुध खोयी
वापस आने की आहट में
में दिन रातें निगाहें रोयी
या याद किया करती हैं
उसकी दी हुई निशानियां
वो पहली बार मिले जंगल
और बनती वो कहानियां
कितने सपने समेटे हुए
कई रातें फिर ना सोयी
कहीं कभी मिल जाती है
आज भी शकुन्तला कोई।।।
जो दुहाई देती है अपने
प्यार और हर निशानी की
समाज से डरती है आज
कल के दुर्वासा की वाणी सी
पर न मिलता है न्याय उसे
ना मिला ही दुष्यन्त कोई
यूँ डरती फिरती है वो
सहमी सहमी खोयी खोयी
कहीं कभी मिल जाती है
आज भी शकुन्तला कोई।।।
निशानी मिली देख दुष्यन्त
वो याद सबकुछ आ गया
मिलने जा पहुंचा वहां
और भरत को भी पा गया
पर आज का दुष्यन्त
सारी यादों को दफना गया
और सवाल उठा फिर से
शकुन्तला फिर है रोई
कहीं कभी मिल जाती है
आज भी शकुन्तला कोई ।।।।।।।

तेरा हक़

क्या हक़ था तुम्हे , यूँ मुझे छोड़ जाने का

किसी और की बात का इतना बुरा मान जाने का

या शायद किसी और के प्यार को अपनाने का

कहा तो होता एक भी बार

मजबूरियां

थी तेरी तो थी मेरी भी कुछ

पर क्या हक़ था मुझे यूँ रुलाने का

अच्छा वो सारे हक़ जो मैंने दे रखे थे

या कुछ तुमने ले भे लिए थे जबर्दस्ती

की तुम मेरे हो तो तेरा सब मेरा

की तुम मेरे हो तो तेरा सब मेरा

फिर क्या हक़ था उस हक़ को मिटाने का

सारे हक़ तेरे थे उसमे

सारा का सारा मैं था तुम्हारा

पर क्या हक़ था मुझे यूँ आज़माने का

अब तो सब खो चुका हूँ मैं

वो कंधा भी जहाँ सर रखके रो सकू

वो दोस्त भी जो मेरा हक़ था जिसपे

या फिर वो की अपने ऊपर अधिकार

कुछ भी तो नहीं बच रहा मुझमे

सिर्फ मैं ही बचा हूँ

फिर क्या हक़ था सब छीन जाने का

वो दोस्त जो मेरे साथ रोया

या मुझसे ज्यादा उसपे क्या हक़ था तुम्हारा

वो माँ मेरी जिसे मेरी तबियत खराब लगती थी

मिन्नतें मांगती रही उसपे क्या हक़ था तुम्हारा

वो भाई जिसने मुझे समझाया

हर पल साथ निभाया उसपे क्या हक़ था

की अचानक से तेरे खामोश होने का

क्या हक़ था तेरा यूँ खोने का

चलो सब मुझसे जुड़े है मेरी खातिर

पर मेरा भी तो हक़ दो

वो हक़ जो रात भर तेरे एक

मैसेज की खातिर जगा पर आया नहीं

जो तुमसे बात करने को

घर से बहाने मार कर निकल जाता

पर तभी तुम बिजी होती

या फिर वो हक़ जो इंतज़ार में काटी

या मेरा वो हक़ जो तेरी ओर बांटी

अरे इत्ता न सही फिर दोस्ती का भी तो

एक वो हक़ जो लड़ा खुदसे तेरे लिए

हक़ जो तेरे लिए हर सांस में था

वो हक़ की सपने तेरे देखे थे मैंने

या वो हक़ जो आज भी इंतज़ार में है

या फिर वो हक़ जो मेरे प्यार में है।।।।

तू यहीं है नहीं।।

तू यहाँ है नहीं
है इस पल हर जगह
धक्के खाती बस में
सुकून की हवा
हर शायर की जूझ में
तू दर्द सी दवा
और एक शांत बहती
नदी की धार सा
या फिर ढूंढता फिरे
तू तेरा पता
तू यहाँ है नहीं
है इस पल हर जगह

पुरे जेठ की धूप में
एक ठंढी दुआ
कहीं किसी के लिए
एक जीने की वजह
तो कहीं आईना है
जैसा मिले वैसा मिला
या बच्चों के खेल में
एक मुस्काती वफ़ा
तू यहाँ है
नहीं
है इस पल हर जगह।।।

बात की बात

बात की बात में बात ही चली गई
यूँही मुलाकातों में रात ही चली गई
जो बात जुबाँ पे थी आके रुकी कबसे
लहरों उठी तो वो बात ही चली गई
सवेरा जब हुआ हुई तलाश रात की
रात में जो बात थी वो बात ही चली गई ।।।