अब भी वो रो पड़ती होगी

छुप छुप के कही पोस्ट
मेरी पढती होगी,
मेरी तस्वीरों से तंहाई मे
लड़ती होगी ,
जब भी मेरी याद उसे
आती होगी,
लगता है अब
भी वो रो पड़ती होगी,
.
किसी दुजे नाम से फेसबुक पे आई
होगी,
ID कोई fake जरूर बनाई होगी,
कोई मुझमें कमी निकाले
तो वो चिड़ती होगी,
लगता है अब
भी वो रो पड़ती होगी,
.
मेरा हर अपडेट उसे अब
भी युंही भाता होगा,
मेरा अक्स सामने उसके आ ही जाता होगा,
जब भी कोई बात
उसकी बिगड़ती होगी,
लगता है अब
भी वो रो पड़ती होगी,
.
लगी मेरी गजलों की लत
वो कैसे छुटेगी,
डरते -डरते रिक्वेस्ट मुझे भेजी होगी,
क्युं छोड़ा मुझे कहकर खुद से
झगड़ती होगी,
लगता है अब
भी वो रो पड़ती होगी,
.
काश कहीं फिर से मिल जाए मुझे,
आकर फिर वही प्यार की बात चलाए
मुझे,
सोच यही मंदिरों में
माथा रगड़ती होगी,
लगता है अब
भी वो रो पड़ती होगी….

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By : Vaibhav Sagar

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तेरी तुझी से लड़ाई हो

ज़माने भर से हो रंजिश, घटा कैसी ही छाई हो,
मजा तो तब है तेरी जब, तुझी से ही लड़ाई हो,   
सितारे गर्दिशो में हो, मुकद्दर हाशिये पर हो ,
रहे इम़ा तेरा सच्चा, की जब जब सर उठाई हो,    
हो जब ये हौसला तेरा, मुसलसल कारवां तेरा,
हो शोले आंख में तेरे, मशालें जब जलाई हो , 
क़यामत से तू ले लोहा, खुदा भी देखता होगा,
अजानो में मगर तेरे उसी की ही खुदाई हो,        
नहीं मुमकिन तेरा दिलवर हमेशा साथ हो तेरे ,
असल जज्बा मुहब्बत का मुहब्बत में जुदाई हो,      
ज़माने भर से हो रंजिश, घटा कैसी ही छाई हो,
मजा तो तब है तेरी जब, तुझी से ही लड़ाई हो  . 

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काश मैं कवि होता

काश मैं कवि होता
स्वचंद पंखी ओ आकाश में
मैं विहग वान हजारो गढता 
किसी सुंदरी की जुल्फो मैं
कभि सोता कभि खोता
काश मैं कवि होता
नित नयी कल्पना के पंख लगा
अंबर मे मैं भि उड़ता
नव पल्लव तरू की डाली
पे मैं भि कोयल सि गाता
काश मैं कवी होता
कही छुपी सायरी को बनाता
अकेले बैठे गुनगुनाता
कई अनकही बाते बताता
कई सुर ताल मिलाता
काश मैं कवि होता
बेर ओर बसंत को मिलाके
नई नई ऋतु बनाता
उनमे तुझको बुलाता
सपनो सा सजता
काश मैं कवि होता
कयी बातें अनकहि
उनसे राज खोल पाता
नयनों की भाषा तेरी
दिल में हि सुनाता
काश मैं कवि होता
आसमान पे लिखता
तेरा नाम बादलों से
प्यार से तेरे भिंग
फिर बरस पड़ता
काश मैं कवि होता
एक पल में हज़ारो
सदियां जीता जाता
ओर कयी सदियां
शब्दों में सजाता
काश मैं कवि होता
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सागर

प्यार की विश्वास की
तेरी अभिलाषा है
सागर
प्रेम परिभाषा है
नयनो से गुजरते रास्तों की
रास्ते किनारे बसी बस्तियां
उन में बैठे
दोस्तों की यारों की
एक अधूरी सी आशा है
सागर
नयी कहानी है
तेरे लब से सुरू होकर जो
मेरे दिल पे आ रुकती है
उनमे कुछ यादें है
तेरी और उन मासूमों की
जो फ़िर दोहराती है
सागर
एक सच है
तेरे मिलने से
तेरे जाने तक की
एक झूठा सच
दोस्तों की मेह्फिल की
दुर बज रहे गानो की
आवजें हैं
सागर
एक झूठ है
कभी खो जाने की
गुमनाम दिल तेरा
मेरा हो जाने की
उन यादों की
जो पल बिते नही
उनकी पुकार है
सागर
एक नया संसार है
सभी एक जैसे का ख्वाब
तेरी बातें सारी सच्ची
मैं झूठा दुनिया झूठी
और सिर्फ तुमसे प्यार है
सागर .

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बातें चांद से

मैं जानता हुँ तुम यहीं हो या कहीं दुर शायद
मैं तुम्हे फ़िर से चाहता हुँ
वापस पाना और जीना
तेरा साथ हर पल हर लम्हा
जब रात को चांद मेरी खिड़की से रोशनी करता है
मैं अकेला बैठ कर उस चांद से बातें करता हुँ
ये सोचकर की तुम भी कहीं
मेरे इंतेजार में चांद का दीदार
कभी तो करती होगी
या फ़िर वो चांद मुझे फ़िर से तेरा पता बतायेगा
दिन में मैं शहर में घूमता हुँ तेरी तलाश में
घर वाले और बाहर वाले समझते हैं मैं पागल हो गया हुँ
शायद हाँ मैं हो गया हुँ , लेकिन वो नाहि जानते की,
मेरा सब कुछ तुम ही तो हो
और फ़िर रात में जब चाँद करता है मेरे कमरे में रोशनी
मैं उस चांद से करता हुँ
तेरी ही बातें
सिर्फ
तेरी ही बातें

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Vaibhav sagar

एक और कहानी

मेरी भी एक कहानी थी
कोई राजा था या नही पर
इक मासूम सी रानी थी
तीखे नैन और प्यारी बातें
इठ्लाती थी बलखाती थी
थोडा बचपन थोडी खुशियां
और बांकी बची जवानी थी
एक बचपन में बात हुइ
रानी से मुलकात हुइ
कुछ बातें हुइ कुछ झगडे
फिर दोस्त बने कुछ समझाया
जीने का सलिका सिखलाया
यूँ रानी बडी सयानी थी
दोस्ती भी पुरानी थी
दुर हो गया था रानी से वो
रानी सब भुल गयी थी
सात साल बाद मिले फ़िर जो
सब याद दिला के उसने
फिर से दोस्ती पायी थी
अब खो चुका था रानी में वो
सोचा बोल देगा रानी को वो
रानी ने सुना दी कहानी थी
कह डाला एक राजा भी था
रानी की जान बसती थी
फिर लडके ने उनको मिलवाया
आरी चली दिल कसम दे गया
आंख से निकले ना आँसू
बस हँस के वो सनम दे गया
दुर चला था जिन्दगी से फ़िर
रानी ने याद फ़रमाया
रो रो के सब कुछ था सुनाया
लड़के के दोस्त ने फ़िर
लड़के का हाल ए दिल बताया
रानी ने पुछा लड़के से
लद्का सुन के रो दिया
अपनी हैसियत को सोच
डर डर के हां कर गया
फिर बातें सुरू हो गयी
कुछ ज्यादा सपने देखे
और याद में सो गया
फ़िर कस्मे वादे की बारी
लिये गये कयी इरादे
परवान चढ रही थी यारी
एक दिन रानी अचानक
कहीं चली गयी थी
ना याद किया न करने दिया
किसी तरह फ़िर बात हुइ
रानी ने कहा बाहर थी वो
बाद की बाद को देख
लद्का रोने लगा
सपनो को तोड़ डाला
समय बित रहा था
रानी क पैगाम आया
लद्का बहुत हर्सया
कोई ओर राजा भा गया
लड़के को समझ आ गया
अब रानी का पता नही लगाता
उसके बचपन को याद करके
लद्का बस जीता जाता. . .

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Vaibhav sagar

वो लड़का

वो लड़का आता सकुचाता
एक गठरी लिये कान्धे
फिर कुछ फटा पाता.
न किसी का गुमान
न होने का एहसास
अपने आप में इठ्लाता.
फ़िर उपेछा भरी निगाहे
जनमानस पर डाल
हौले मुस्कुरता .
कुछ छिपाने की कोशिश
खुद को बचाने की कोशिश
मैं आगे बढ जाता.
स्वभिमान भी था
खुद के वजुद के लिये
न चाहते हुए भी खाता.
खुश था या नही
पर खुशी दिखता.
लड़खडाता
फिर सम्भल जाता.
अपनी दुनिया थी
शायद खुद बनायी
एक वो और
उसके जैसे की
वो उनमे समाता.
मुझे जलन देने लगी
उसकी मुस्कान
जा पुछा  पहचान
वो मुकर गया
बिना पहचान
बताये गुजर गया
मेरी गरीबी की तारीफ़
मुझे नज़र आ रही थी
मेरी सोच मुझे रुला
रही थी.
फिर उस जैसा कोई और
आ गया
जीने का मर्म सिखा गया.
वो अब भि आता
है कभी दायेँ कभी बायेँ
नज़र डाले धीरे से चिजे
उठाता.
उसकी झोली उसका पालन
उसका बिछावन.
अब नही जलता हूँ मैं
मुस्कुरा देता देख उसे
फ़िर वो गयब हो जाता. . .

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Vaibhav sagar