दो पल क़याम करता चलूँ

जो तुम रोक लो दो पल क़याम करता चलूँ

तुम्हारी नज़रो में खोकर मैं शाम करता चलूँ

तेरी दिल्लगी को जाना तो ये दिल की लगी हो

तेरी बातों को सुनना मेरी आशिक़ी हो

न रह पाने का गुमशुम अगर तज़ुर्बा हो तुम्हे 

तो मेरे साथ चलना ओर फासले मुल्तवी हो

तुम्हारी हाथों के छुवन को पैगाम कहता चलूँ

जो तूम रोक ले मुझको दो पल क़याम करता चलूँ

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मिलने की फिर से अगर तेरी ख्वाइश हो

ज़माने भर से हो रंजिश घटा कैसी भी छायी हो

अगर दीदार की खातिर कहीं जाना पड़े तो

थोड़ा तुम सफर करना थोड़ा साथ तन्हाई हो

फिर मिलूं तो तेरे अरमानों का एहतराम करता चलूँ

जो तुम रोक लो मुझको दो पल क़याम करता चलूँ 

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तुम्हारी बाहों के घेरे में मेरा अपना बसेरा हो

तुम्हारी जुल्फों के नीचे मेरा हेर सवेरा हो

तुम्हारी नज़रों में देखूं यहां मैं ये दुनिया सारी

हमेशा साथ रहूँ तेरे मौका चाहे अन्धेरा हो

की बस तुझको चाहने का इल्जाम करता चलूँ 

तेरे बेपरवाह ख्यालों का गुमान करता चलूँ

जो तुम रोक लो मुझको दो पल क़याम करता चलूँ

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©वैभव सागर


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तेरी तस्वीर

दिन के इन उजालों में 

जो आंखे बंद मैं कर लूं

तेरा चेहरा दिखे मुझको

तो सांसे फिर भर लूं मैं,,

पूरी दुनियादारी से दूरी 

तेरी दूरी से कम लगती

दूरी मिटाने की खातिर

तुझको याद कर लूं मैं,,

किसी रोज बातें ना करना

तड़पना मुझको जलाना

और मैं जो जल जाऊं 

तो दूरी फिर सताती है ,,

तेरी तस्वीर सिरहाने 

लिए बैठा रहा हूँ मैं

अब तुझको क्या कह दूं

क्या रूठा रहा हूँ मैं,,


मुझको मनाने का हुनर

तुझे ये कब से आता है

तेरी तस्वीर के साये में 

अब जीता रहा हूँ मैं ,,,,
©वैभव सागर 

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे 

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे 

जो है तो बेवजह आओ वक़्त गुजारे 

मैं बातें फिर सारी तुम्हारी करूँगा 

तुम मुझको सुनती जाना 

मैं तेरे मन की कहता जो जाऊं

तुम मेरा मन भी पढ़ती जाना 

इठलाना और मुझसे दूर भागना

और तेरे पीछे मैं दौडूं तेरा नाम पुकारे 

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे

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जो चाहो तो भर लेना मुझको बाहों में अपनी 

या फिर यूँ ही मेरी ओर देख मुस्कुराना 

की आँखों के इशारे तेरे पढ़ जो लूंगा

तूम मन ही मन सब कहती जाना 

या गर चाहो जो तो मैं दूर नज़र आऊं

पर क्या होगा गर घबराहट मेरी बातें बिगाड़े

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे

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तेरी अधरें जो कांपी तो अपनी से छु लूंगा 

 हमारे मिलने की बातें सरेआम कह दूंगा 
और तुम मेरे लब पे अपने लब रखो 

की ऐसी रिसवत जो मुझे चुप कराये 

कोई पूछे तेरी हालात तो मेरा नाम दो बताये 

और अगली बार मिलने घंटो खुद को सवारे

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे । । ।

©वैभव सागर 

तू मुझसे वाकिफ मैं तुझसे वाकिफ

इक धुप दोपहरी मिलने आना तेरा 

और अंजाम से मैं वाकिफ 

वो मुरझाये गुलाब के फूल तेरे

और उनको चुपके से थमाना तेरा

की उसकी जान से मैं वाकिफ 

खुदको परेशान कह कह के 

मुझको यूँ तड़पाना तेरा 

फिर खुलके हंसना 

या मुस्कुराना तेरा

उस मुस्कान से मैं वाकिफ

तेरी बातें बहुत सारी

कुछ अल्हड सी और कुछ प्यारी

और उनको सुनते जाना मेरा

तेरी हर बात से मैं वाकिफ

कभी मेरी बातों की भी 

तुम तस्वीर बना लेती होगी 

तुम मेरी इश्क़ से वाकिफ

मैं तेरे इश्क़ से वाकिफ

कितनी ही दफा तेरा मैं 

नाम पुकारा करता हूँ

तू मेरी रग रग से वाकिफ

मैं तेरे नाम से वाकिफ । । ।

वैभव सागर

गुमनाम गाँव

मेरे नाम के चर्चे जमाने आम होते हैं 

तो फ़िर ये गाँव क्यू मेरा यहाँ गुमनाम रह जाये

कयी बातें कयी यादें जुड़ी है गाँव से मेरे 

तो फ़िर ये गाँव क्यू मेरा महज इक नाम रह जाये

यहाँ एक नदी गुजरती है जिसके दो बेसब्र किनारे हैं 

किनारों पे अगर बैठो यहाँ दिलकश नज़ारे हैं 

पुरी कायनात सी हरियाली यहाँ खेतों में दिखती है 

गाँव के बिचों बीच इक सड़क गुजरती है 

कभी तुम राहगीर बनकर यहाँ से गुजर कर देखो 

थम जाओ इक पल अगर जो निगाहें थम जाये

तो फ़िर ये गाँव क्यू मेरा यहाँ गुमनाम रह जाये
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Click here to listen this poem in the voice of vaibhav sagar

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कयी बातें और कहानियाँ यहाँ सबकी जुबाँ से है 

जो तुम सुनो उनको तो सब बेजुबां से है 

अगर झांको घरो में तो लोग नही बस दिल ही मिलते है 

ये कड़वा सच और है की ठंडे चुल्हे जलते हैं 

एक मंदिर का आँगन खुला तारों की छत पीछे 

कभी तुम आओ तो बैठो अशोक की छाँव के नीचे 

जहाँ हर शाम तुमको कितने ही चेहरे नज़र आये

तो फ़िर ये गाँव क्यू मेरा यहाँ गुमनाम रह जाये
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वैभव सागर

डूब जाऊँ मैं 

है बातें तेरी एक उलझन 

उलझ तुझको निहारू मैं 

ये आंखे झील है तेरी 

जो इनमे कूद जाऊँ मैं 

तू चाहे पार कर देना

या शायद डूब जाऊँ मैं .

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तेरी लटें काली बदरी 

तेरे चेहरे पे आती है 

तू बार बार सवारे इसे 

ये खुली खुली इठ्लाती है 

अदाओं पे सवर जाऊँ मैं 

तू चाहे पार कर देना

या शायद डूब जाऊँ मैं 

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उभरे हुए हैं गाल तेरे 

और सुर्ख गुलाबी होंठ 

खिलखिलाती तेरी हँसी 

थोडी पागल वाली सोच 

जिनमे टूट बिखर जाऊँ मैं 

तू चाहे पार कर देना 

या शायद डूब जाऊँ मैं .

©वैभव सागर

आधा इश्क (प्रारंभ)-1

Era of aadha ishq

Starts from here

Presenting you

Aadha ishq series poems…

Feel the words.

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मेरा हर कदम तेरी ओर बढा

तू एक कदम गर साथ चले

वो पल दो पल का सफ़र 

बस यादों के लिये संजोता हुँ 

माना मैं नही हुँ तुझमे पर 

मैं मेरा आधा इश्क जीता हुँ

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तेरे इंकार की भी हद होगी 

मेरा इजहार भी बेहद निकला

तेरे नज़रों से टकराकर मैं 

जो बेवक्त इक सफ़र निकला

उस सफ़र के मंज़िल को जीता हुँ 

माना मैं नही हुँ तुझमे पर 

मैं मेरा आधा इश्क जीता हुँ

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है आँसू भी इन राहों में शायद

पर तेरा मुस्कुराना गज़ब का है 

पलट के देखना वो मेरा तुझको 

तेरा बड़बडाना अजब नशा है 

आंखे तरेरना और मुझे डराना

उस डर को मैं जीता हुँ 

माना मैं नही हुँ तुझमे पर 

मैं मेरा आधा इश्क जीता हुँ.

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तेरे बिन भी मैं हुँ पुरा 

ना कुछ खाली सा है मुझमे 

ना तुझ बिन कुछ अधूरा 

ना दर्द है ना तुमसे शिकायत 

ना ही दुआ है तू न इबादत 

आंखो के सागर को मैं 

अंदर ही अंदर पीता हुँ 

माना मैं नही हुँ तुझमे 

मैं मेरा आधा इश्क जीता हुँ

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वैभव सागर 

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Feel the words.

Feel the love in the air.

वो अनकहा सा प्यार -1

​पहला दिन पहली नज़र 

मासूम हँसी और 

दिल का मेरे इकरार

वो अनकहा सा प्यार

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बातें हुइ चंद यादें हुइ 

कुछ खोया खोया लगता था

मुझमे ही तो थी मैं पर

मन सोया सोया रहता था

मुझे झ्झोडा जिसने वो था

एक शर्मीला मेरा यार 

वो अनकहा सा प्यार 

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था फर्ज हिलोरे मारता

वतन की मोहब्बत कौन जानता

आन्धियां चली मेरे मन में

वो जा रहा था दुर कहीं 

बस आँसू ही थे बिछडन में

थी बातें जुबान पर कयी

पर लब खुल ना पा रहे

बस इतना तो पूछूँ मैं 

“सच मुझे छोडकर जा रहे?”

दिलों में था जो इंकार 

वो अनकहा सा प्यार

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पलट के भी ना देखना

आँसुओं की कीमत पायी है 

है कोरा सच ये बिल्कुल

इसमे थोडी रुसवाई है 

अगर पलटी मैं या पलटा वो

तो शायद सब थम जाता

जी लेते मिलकर हम 

तो क्युँ ना पलटू इक बार

ये था अनकहा मेरा प्यार
वैभव सागर

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.Story by :- kajal singh

Poem by :- vaibhav sagar 

तू तुझमे कोई और है 

​कुछ बातें हैं तेरी बेबाक सी

कुछ बातों में तू मौन है 

कयी राज़ है इस चुप्पी में

पर खामोशियों में एक शोर है 

बस इतना ये कह जाती है 

तू तुझमें कोई और है 

कहीं धरा आकार है तेरा 

कहीं धनक का तू रंग है 

मधुर बिहग सुर में तेरे 

एक बिरह का भी अंग है 

सरगम पे एक मोर है नाचता 

वो तुझमे तेरे संग है 
नदी के बहते पानी सी 

और आसमानो की  सोच है 

कुछ इरादे भी हैं तेरे 

और उनमे ही तेरी मौज है 

ये पेड़ , हवा , बारिश जो है 

तू बँधा इनसे एक डोर है 

सब तुझमे है तुझसे पर 

तू तुझमे कोई और है

वैभव सागर

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For my dearest friend 

Debopam 

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इक पगली लड़की है

है राह नही ना ही मंज़िल 

बस राही मेरी दोस्त है वो 

एक झल्ली सी लड़की है 

सब पूछे तेरी कौन है वो

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अफ़साने कितने अंजाने हैं 

कुछ नये हैं  कुछ पुराने हैं

कुछ बनते बनते बन जाते

कोई कहते कहते पूछे वो 

इक लड़की देखी थी पागल 

मुझको बता तेरी कौन है वो 

है जबाब नहीं इन सवालों का

बस इक लाचारी सी लगती है 

पर उस पगली की बातें फ़िर 

इन सब पर भारी लगती है 

है नासमझी की हर हद वो

जो बैठ कभी समझूँ उसको 

खुदसे पूछूँ मेरी कौन है वो

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जब चाहत की बातें आती हैं 

मेरे सर की नस दुख जाती है 

नासमझ मुझे समझाती है 

मैं बातों में बहका जाता हुँ 

और पागल मुझे बेहकाती है 

है दुनियादारी की सारी समझ 

दुनियां के लिये अन्जान है वो 

तू इससे पहले फ़िर पूछे की 

मुझसे मेरी ही पहचान है वो 

तूने जो पगली लड़की देखी है

मेरी दोस्ती का प्यारा नाम है वो . . .

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वैभव सागर

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yes, a boy and a girl can be a good friend… 

All we need to change our mind and our thoughts, just respect as a girl and treat as a friend.

Note it down that one good friend is beeter then 1000 sham friends.