आज की शकुन्तला

कही कभी मिल जाती है
आज भी शकुन्तला कोई ।।।
जो दुष्यन्त के ख्यालों में
रहती है अपनी सुध खोयी
वापस आने की आहट में
में दिन रातें निगाहें रोयी
या याद किया करती हैं
उसकी दी हुई निशानियां
वो पहली बार मिले जंगल
और बनती वो कहानियां
कितने सपने समेटे हुए
कई रातें फिर ना सोयी
कहीं कभी मिल जाती है
आज भी शकुन्तला कोई।।।
जो दुहाई देती है अपने
प्यार और हर निशानी की
समाज से डरती है आज
कल के दुर्वासा की वाणी सी
पर न मिलता है न्याय उसे
ना मिला ही दुष्यन्त कोई
यूँ डरती फिरती है वो
सहमी सहमी खोयी खोयी
कहीं कभी मिल जाती है
आज भी शकुन्तला कोई।।।
निशानी मिली देख दुष्यन्त
वो याद सबकुछ आ गया
मिलने जा पहुंचा वहां
और भरत को भी पा गया
पर आज का दुष्यन्त
सारी यादों को दफना गया
और सवाल उठा फिर से
शकुन्तला फिर है रोई
कहीं कभी मिल जाती है
आज भी शकुन्तला कोई ।।।।।।।

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तेरा हक़

क्या हक़ था तुम्हे , यूँ मुझे छोड़ जाने का

किसी और की बात का इतना बुरा मान जाने का

या शायद किसी और के प्यार को अपनाने का

कहा तो होता एक भी बार

मजबूरियां

थी तेरी तो थी मेरी भी कुछ

पर क्या हक़ था मुझे यूँ रुलाने का

अच्छा वो सारे हक़ जो मैंने दे रखे थे

या कुछ तुमने ले भे लिए थे जबर्दस्ती

की तुम मेरे हो तो तेरा सब मेरा

की तुम मेरे हो तो तेरा सब मेरा

फिर क्या हक़ था उस हक़ को मिटाने का

सारे हक़ तेरे थे उसमे

सारा का सारा मैं था तुम्हारा

पर क्या हक़ था मुझे यूँ आज़माने का

अब तो सब खो चुका हूँ मैं

वो कंधा भी जहाँ सर रखके रो सकू

वो दोस्त भी जो मेरा हक़ था जिसपे

या फिर वो की अपने ऊपर अधिकार

कुछ भी तो नहीं बच रहा मुझमे

सिर्फ मैं ही बचा हूँ

फिर क्या हक़ था सब छीन जाने का

वो दोस्त जो मेरे साथ रोया

या मुझसे ज्यादा उसपे क्या हक़ था तुम्हारा

वो माँ मेरी जिसे मेरी तबियत खराब लगती थी

मिन्नतें मांगती रही उसपे क्या हक़ था तुम्हारा

वो भाई जिसने मुझे समझाया

हर पल साथ निभाया उसपे क्या हक़ था

की अचानक से तेरे खामोश होने का

क्या हक़ था तेरा यूँ खोने का

चलो सब मुझसे जुड़े है मेरी खातिर

पर मेरा भी तो हक़ दो

वो हक़ जो रात भर तेरे एक

मैसेज की खातिर जगा पर आया नहीं

जो तुमसे बात करने को

घर से बहाने मार कर निकल जाता

पर तभी तुम बिजी होती

या फिर वो हक़ जो इंतज़ार में काटी

या मेरा वो हक़ जो तेरी ओर बांटी

अरे इत्ता न सही फिर दोस्ती का भी तो

एक वो हक़ जो लड़ा खुदसे तेरे लिए

हक़ जो तेरे लिए हर सांस में था

वो हक़ की सपने तेरे देखे थे मैंने

या वो हक़ जो आज भी इंतज़ार में है

या फिर वो हक़ जो मेरे प्यार में है।।।।

तू यहीं है नहीं।।

तू यहाँ है नहीं
है इस पल हर जगह
धक्के खाती बस में
सुकून की हवा
हर शायर की जूझ में
तू दर्द सी दवा
और एक शांत बहती
नदी की धार सा
या फिर ढूंढता फिरे
तू तेरा पता
तू यहाँ है नहीं
है इस पल हर जगह

पुरे जेठ की धूप में
एक ठंढी दुआ
कहीं किसी के लिए
एक जीने की वजह
तो कहीं आईना है
जैसा मिले वैसा मिला
या बच्चों के खेल में
एक मुस्काती वफ़ा
तू यहाँ है
नहीं
है इस पल हर जगह।।।

बात की बात

बात की बात में बात ही चली गई
यूँही मुलाकातों में रात ही चली गई
जो बात जुबाँ पे थी आके रुकी कबसे
लहरों उठी तो वो बात ही चली गई
सवेरा जब हुआ हुई तलाश रात की
रात में जो बात थी वो बात ही चली गई ।।।

RE:-मोहब्बत नाम हो जाये

After a hard time again ,I am  inspired by reading aastha gangwar Posts and by call and texts of mayank bhai .Thank you . . और आपलोगों के लिये खास मोहब्बत नाम हो जाये. . .

तेरे इश्क में मेरा ये इल्जाम हो जाये जो देखूँ तुझको तो मोहब्बत नाम हो जाये

तुझे ढूँढू दर-ब-दर और पालूँ सपनों में ना खोना चाहूँ बस रहना साथ मेरे

तेरी आंखोँ में जो देखूँ आईना नज़र आये तुम्हारी मासूमियत का भी मोहब्बत नाम हो जाये

तेरी जुल्फें तेरी आंखेँ तू और तेरी बातें मुझे याद आती है तेरे जाने पे तेरी साँसें

तेरी आवाज से मिलकर मेरे अल्फाज गीत बन जाये

दो चार बातें फ़िर करलुं  चर्चे दिवाने आम हो जाये हमारी दीवानगी का भी मोहब्बत नाम हो जाये

तू चले , मैं धूल बनू उड़ जाऊँ हवाओं में तुझसे

तेरी एक छूवन का एहसास मेरे रोम रोम में बस जाये

तुझको रब मान माँगू तुझी से तू मिल तो ख्वाब मुकम्मल हो जाये

जो तुम हसने लगों बातों से मेरी दो पल यहीं पर रुक जाये

तुम मुझमे मिल जाओ ऐसे की मोहब्बत नाम हो जाये

कभी मेरी किताबों के भी पन्ने चार तुम देख लेना

हमारे मिलने की बातें कभी  सरेआम तुम कह देना

थोडा मैं बदनाम हुँ इश्क में थोडा तू भी बदनाम हो जाये

हमारे खूबसूरत इश्क का फ़िर मोहब्बत नाम हो जाये. . .

To be continued. . .

वैभव सागर

दो पल क़याम करता चलूँ

जो तुम रोक लो दो पल क़याम करता चलूँ

तुम्हारी नज़रो में खोकर मैं शाम करता चलूँ

तेरी दिल्लगी को जाना तो ये दिल की लगी हो

तेरी बातों को सुनना मेरी आशिक़ी हो

न रह पाने का गुमशुम अगर तज़ुर्बा हो

तो मेरे साथ चलना ओर फासले मुल्तवी हो

तुम्हारी हाथों के छुवन को पैगाम कहता चलूँ

जो तूम रोक ले मुझको दो पल क़याम करता चलूँ

.

मिलने की फिर से अगर तेरी ख्वाइश हो

ज़माने भर से हो रंजिश घटा कैसी भी छायी हो

अगर दीदार की खातिर कहीं जाना पड़े तो

थोड़ा तुम सफर करना थोड़ा साथ तन्हाई हो

फिर मिलूं तो तेरे अरमानों का एहतराम करता चलूँ

जो तुम रोक लो मुझको दो पल क़याम करता चलूँ

.

तुम्हारी बाहों के घेरे में मेरा अपना बसेरा हो

तुम्हारी जुल्फों के नीचे मेरा हेर सवेरा हो

तुम्हारी नज़रों में देखूं यहां मैं ये दुनिया सारी

हमेशा साथ रहूँ तेरे मौका चाहे अन्धेरा हो

की बस तुझको चाहने का इल्जाम करता चलूँ

तेरे बेपरवाह ख्यालों का गुमान करता चलूँ

जो तुम रोक लो मुझको दो पल क़याम करता चलूँ

.

©वैभव सागर

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे 

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे 

जो है तो बेवजह आओ वक़्त गुजारे 

मैं बातें फिर सारी तुम्हारी करूँगा 

तुम मुझको सुनती जाना 

मैं तेरे मन की कहता जो जाऊं

तुम मेरा मन भी पढ़ती जाना 

इठलाना और मुझसे दूर भागना

और तेरे पीछे मैं दौडूं तेरा नाम पुकारे 

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे

.

जो चाहो तो भर लेना मुझको बाहों में अपनी 

या फिर यूँ ही मेरी ओर देख मुस्कुराना 

की आँखों के इशारे तेरे पढ़ जो लूंगा

तूम मन ही मन सब कहती जाना 

या गर चाहो जो तो मैं दूर नज़र आऊं

पर क्या होगा गर घबराहट मेरी बातें बिगाड़े

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे

.


तेरी अधरें जो कांपी तो अपनी से छु लूंगा 

 हमारे मिलने की बातें सरेआम कह दूंगा 
और तुम मेरे लब पे अपने लब रखो 

की ऐसी रिसवत जो मुझे चुप कराये 

कोई पूछे तेरी हालात तो मेरा नाम दो बताये 

और अगली बार मिलने घंटो खुद को सवारे

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे । । ।

©वैभव सागर 

तू मुझसे वाकिफ मैं तुझसे वाकिफ

इक धुप दोपहरी मिलने आना तेरा 

और अंजाम से मैं वाकिफ 

वो मुरझाये गुलाब के फूल तेरे

और उनको चुपके से थमाना तेरा

की उसकी जान से मैं वाकिफ 

खुदको परेशान कह कह के 

मुझको यूँ तड़पाना तेरा 

फिर खुलके हंसना 

या मुस्कुराना तेरा

उस मुस्कान से मैं वाकिफ

तेरी बातें बहुत सारी

कुछ अल्हड सी और कुछ प्यारी

और उनको सुनते जाना मेरा

तेरी हर बात से मैं वाकिफ

कभी मेरी बातों की भी 

तुम तस्वीर बना लेती होगी 

तुम मेरी इश्क़ से वाकिफ

मैं तेरे इश्क़ से वाकिफ

कितनी ही दफा तेरा मैं 

नाम पुकारा करता हूँ

तू मेरी रग रग से वाकिफ

मैं तेरे नाम से वाकिफ । । ।

वैभव सागर

#99

झूठ में वो सच ना कहना

अल्फाज़ मुकम्मल मिल जाये

इक बूँद गिरे दिल के अंदर 

तेरे नाम पे सारा बह जाये.

©vaibhav sagar

Jhuth main bhe wo sach na kehna

Alfaaz mukammal mil jaaye

Ek boond gire dil ke andar

Tere naam pe sara beh jaaye .

.

वो अनकहा सा प्यार -1

​पहला दिन पहली नज़र 

मासूम हँसी और 

दिल का मेरे इकरार

वो अनकहा सा प्यार

.

बातें हुइ चंद यादें हुइ 

कुछ खोया खोया लगता था

मुझमे ही तो थी मैं पर

मन सोया सोया रहता था

मुझे झ्झोडा जिसने वो था

एक शर्मीला मेरा यार 

वो अनकहा सा प्यार 

.

था फर्ज हिलोरे मारता

वतन की मोहब्बत कौन जानता

आन्धियां चली मेरे मन में

वो जा रहा था दुर कहीं 

बस आँसू ही थे बिछडन में

थी बातें जुबान पर कयी

पर लब खुल ना पा रहे

बस इतना तो पूछूँ मैं 

“सच मुझे छोडकर जा रहे?”

दिलों में था जो इंकार 

वो अनकहा सा प्यार

.

पलट के भी ना देखना

आँसुओं की कीमत पायी है 

है कोरा सच ये बिल्कुल

इसमे थोडी रुसवाई है 

अगर पलटी मैं या पलटा वो

तो शायद सब थम जाता

जी लेते मिलकर हम 

तो क्युँ ना पलटू इक बार

ये था अनकहा मेरा प्यार
वैभव सागर

.

.Story by :- kajal singh

Poem by :- vaibhav sagar