#107

मेरी बेपरवाही और तेरा ख्याल

अलग अलग पहलू हैं 

इस इश्क़ तेरे मेरे 

मुकम्मल की 
©वैभव 

दो पल क़याम करता चलूँ

जो तुम रोक लो दो पल क़याम करता चलूँ

तुम्हारी नज़रो में खोकर मैं शाम करता चलूँ

तेरी दिल्लगी को जाना तो ये दिल की लगी हो

तेरी बातों को सुनना मेरी आशिक़ी हो

न रह पाने का गुमशुम अगर तज़ुर्बा हो तुम्हे 

तो मेरे साथ चलना ओर फासले मुल्तवी हो

तुम्हारी हाथों के छुवन को पैगाम कहता चलूँ

जो तूम रोक ले मुझको दो पल क़याम करता चलूँ

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मिलने की फिर से अगर तेरी ख्वाइश हो

ज़माने भर से हो रंजिश घटा कैसी भी छायी हो

अगर दीदार की खातिर कहीं जाना पड़े तो

थोड़ा तुम सफर करना थोड़ा साथ तन्हाई हो

फिर मिलूं तो तेरे अरमानों का एहतराम करता चलूँ

जो तुम रोक लो मुझको दो पल क़याम करता चलूँ 

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तुम्हारी बाहों के घेरे में मेरा अपना बसेरा हो

तुम्हारी जुल्फों के नीचे मेरा हेर सवेरा हो

तुम्हारी नज़रों में देखूं यहां मैं ये दुनिया सारी

हमेशा साथ रहूँ तेरे मौका चाहे अन्धेरा हो

की बस तुझको चाहने का इल्जाम करता चलूँ 

तेरे बेपरवाह ख्यालों का गुमान करता चलूँ

जो तुम रोक लो मुझको दो पल क़याम करता चलूँ

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©वैभव सागर


#104

तुम्हारी धीमी सी आहट
और दिल को पता चल जाता है

तुम्हारी लड़खड़ाती आवाज

और मेरा दिल बखूबी जानता है…

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#vaibhav

तेरी तस्वीर

दिन के इन उजालों में 

जो आंखे बंद मैं कर लूं

तेरा चेहरा दिखे मुझको

तो सांसे फिर भर लूं मैं,,

पूरी दुनियादारी से दूरी 

तेरी दूरी से कम लगती

दूरी मिटाने की खातिर

तुझको याद कर लूं मैं,,

किसी रोज बातें ना करना

तड़पना मुझको जलाना

और मैं जो जल जाऊं 

तो दूरी फिर सताती है ,,

तेरी तस्वीर सिरहाने 

लिए बैठा रहा हूँ मैं

अब तुझको क्या कह दूं

क्या रूठा रहा हूँ मैं,,


मुझको मनाने का हुनर

तुझे ये कब से आता है

तेरी तस्वीर के साये में 

अब जीता रहा हूँ मैं ,,,,
©वैभव सागर 

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे 

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे 

जो है तो बेवजह आओ वक़्त गुजारे 

मैं बातें फिर सारी तुम्हारी करूँगा 

तुम मुझको सुनती जाना 

मैं तेरे मन की कहता जो जाऊं

तुम मेरा मन भी पढ़ती जाना 

इठलाना और मुझसे दूर भागना

और तेरे पीछे मैं दौडूं तेरा नाम पुकारे 

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे

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जो चाहो तो भर लेना मुझको बाहों में अपनी 

या फिर यूँ ही मेरी ओर देख मुस्कुराना 

की आँखों के इशारे तेरे पढ़ जो लूंगा

तूम मन ही मन सब कहती जाना 

या गर चाहो जो तो मैं दूर नज़र आऊं

पर क्या होगा गर घबराहट मेरी बातें बिगाड़े

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे

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तेरी अधरें जो कांपी तो अपनी से छु लूंगा 

 हमारे मिलने की बातें सरेआम कह दूंगा 
और तुम मेरे लब पे अपने लब रखो 

की ऐसी रिसवत जो मुझे चुप कराये 

कोई पूछे तेरी हालात तो मेरा नाम दो बताये 

और अगली बार मिलने घंटो खुद को सवारे

आओ एक शाम बैठो नदी के किनारे । । ।

©वैभव सागर 

#100

बेवजह बातें हमारी तुम्हारी 

मैं तुमको सुनते जाता हूँ

तुम मुझको सुनती जाती हो

मेरे बहुत सवालों का तुम 

एक जबाब दे पाती हो

ये कुछ नहीं तेरा मेरा 

कितना कुछ होता है ना ।

वैभव सागर 

गुमनाम गाँव

मेरे नाम के चर्चे जमाने आम होते हैं 

तो फ़िर ये गाँव क्यू मेरा यहाँ गुमनाम रह जाये

कयी बातें कयी यादें जुड़ी है गाँव से मेरे 

तो फ़िर ये गाँव क्यू मेरा महज इक नाम रह जाये

यहाँ एक नदी गुजरती है जिसके दो बेसब्र किनारे हैं 

किनारों पे अगर बैठो यहाँ दिलकश नज़ारे हैं 

पुरी कायनात सी हरियाली यहाँ खेतों में दिखती है 

गाँव के बिचों बीच इक सड़क गुजरती है 

कभी तुम राहगीर बनकर यहाँ से गुजर कर देखो 

थम जाओ इक पल अगर जो निगाहें थम जाये

तो फ़िर ये गाँव क्यू मेरा यहाँ गुमनाम रह जाये
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कयी बातें और कहानियाँ यहाँ सबकी जुबाँ से है 

जो तुम सुनो उनको तो सब बेजुबां से है 

अगर झांको घरो में तो लोग नही बस दिल ही मिलते है 

ये कड़वा सच और है की ठंडे चुल्हे जलते हैं 

एक मंदिर का आँगन खुला तारों की छत पीछे 

कभी तुम आओ तो बैठो अशोक की छाँव के नीचे 

जहाँ हर शाम तुमको कितने ही चेहरे नज़र आये

तो फ़िर ये गाँव क्यू मेरा यहाँ गुमनाम रह जाये
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वैभव सागर

#95

​रहता हूँ मैखाने में तो शराबी न समझ मुझे, 

 

 हर वो शख्स जो मस्जिद से निकले नमाज़ी नहीं होता.. 

वो अनकहा सा प्यार -1

​पहला दिन पहली नज़र 

मासूम हँसी और 

दिल का मेरे इकरार

वो अनकहा सा प्यार

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बातें हुइ चंद यादें हुइ 

कुछ खोया खोया लगता था

मुझमे ही तो थी मैं पर

मन सोया सोया रहता था

मुझे झ्झोडा जिसने वो था

एक शर्मीला मेरा यार 

वो अनकहा सा प्यार 

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था फर्ज हिलोरे मारता

वतन की मोहब्बत कौन जानता

आन्धियां चली मेरे मन में

वो जा रहा था दुर कहीं 

बस आँसू ही थे बिछडन में

थी बातें जुबान पर कयी

पर लब खुल ना पा रहे

बस इतना तो पूछूँ मैं 

“सच मुझे छोडकर जा रहे?”

दिलों में था जो इंकार 

वो अनकहा सा प्यार

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पलट के भी ना देखना

आँसुओं की कीमत पायी है 

है कोरा सच ये बिल्कुल

इसमे थोडी रुसवाई है 

अगर पलटी मैं या पलटा वो

तो शायद सब थम जाता

जी लेते मिलकर हम 

तो क्युँ ना पलटू इक बार

ये था अनकहा मेरा प्यार
वैभव सागर

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.Story by :- kajal singh

Poem by :- vaibhav sagar